गढ़वाल विश्वविद्यालय का फैसला: हिंदी में किया टॉप, तो मिलेगा गोल्ड मेडल

आज की युवा पीढ़ी की रूचि हिंदी भाषा में बिलकुल भी नहीं रह गई है। इस बात का पता उत्तराखंड बोर्ड की 2023 की उच्च विद्यालय और इंटरमीडिएट परीक्षा के परिणामों से चल रहा है, जहां लगभग 9,000 छात्र हिंदी विषय में असफल हुए हैं।

श्रीनगर गढ़वाल। आज की युवा पीढ़ी की रूचि हिंदी भाषा में बिलकुल भी नहीं रह गई है। इस बात का पता उत्तराखंड बोर्ड की 2023 की उच्च विद्यालय और इंटरमीडिएट परीक्षा के परिणामों से चल रहा है, जहां लगभग 9,000 छात्र हिंदी विषय में असफल हुए हैं। वैसे ही, विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा की पढ़ाई करने वाले छात्रों में भी हिंदी को महत्वपूर्ण विषय के रूप में प्राथमिकता नहीं मिल रही है। ऐसे में छात्रों के बीच हिंदी विषय के प्रति जागरूकता और रुचि को बढ़ाने के मकसद से गढ़वाल विश्वविद्यालय ने एक अहम कदम उठाया है।

दरअसल, गढ़वाल विश्वविद्यालय ने अब हिंदी स्नातकोत्तर कार्यक्रम के सर्वोत्तम प्रदर्शन वाले छात्र को “पीतांबर दत्त गोल्ड मेडल” से सम्मानित करने का फैसला लिया है। ये निर्णय को प्रो. अन्नपूर्णा नौटियाल, गढ़वाल विश्वविद्यालय की कुलपति, प्रो. दिवान सिंह, कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति, डीएस-डब्लू के मुख्य नियंता, विभिन्न विभागों के प्रमुख, और गढ़वाल विश्वविद्यालय के संबद्ध कॉलेजों के निदेशकों की बैठक के बाद लिया गया । विशेषज्ञों का मानना है कि हिंदी विषय के प्रति छात्रों का रुझान कम हो गया है और वे इसे पढने में बिलकुल भी रूचि नहीं रखते हैं।

कैंपस वैटेज के लिए गठित हुई कमेटी

प्रो एमएस नेगी ने बताया कि गढ़वाल विवि के छात्र लंबे समय से कैंपस वेटेज की मांग कर रहे थे। उन्होंने बताया कि प्रवेश समिति की बैठक में गढ़वाल विश्वविद्यालय के छात्रों को स्नातकोत्तर में प्रवेश के लिए 5 प्रतिशत कैंपस आरक्षण की मांग की गई थी। अब इस मामले में एक कमेटी गठित कर दी गई है। कमेटी की रिपोर्ट के बाद इस मुद्दे पर फैसला लिया जायेगा।

NEP 2020 में हिंदी समेत क्षेत्रीय भाषा/बोली को मिला सम्मान

उधर नई शिक्षा नीति ( NEP 2020 ) में अब हिंदी सहित 22 से अधिक भाषाओं और क्षेत्रीय बोलियों को शिक्षा के माध्यम के रूप में शामिल किया गया है। इसका अर्थ है कि छात्रों को अब अपने विषय डोमेन के साथ-साथ हिंदी, अंग्रेजी और स्थानीय बोलियों को भी पढ़ने होगा कर इसकी परीक्षा देनी होगी। साथ ही इसे पास करना भी अनिवार्य होगा। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में यह भी प्रावधान किया गया है कि छात्रों को अपनी मातृभाषाओं के प्रति सम्मान महसूस कराना चाहिए। गढ़वाल विश्वविद्यालय में भी अब छात्र गढ़वाली बोली के साथ-साथ हिंदी और अंग्रेजी भाषा की भी पढ़ाई करेंगे।

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