Agrohomeopathy: इंसानों के साथ पेड़-पौध और जानवरों का भी सफल इलाज कर रहे हैं Doctor Vikas Verma, घर के नींबू के पेड़ ने बदल दी जिंदगी

 देशभर के किसानों की नई उम्मीद बने फसलों के Doctor Vikas Verma, आप भी जानिए उनकी कहानी

आजकल टीम, नई दिल्ली

उत्तर प्रदेश के बरेली में एक होम्योपैथी डॉक्टर (Homeopathy Doctor) के खेती के प्रति लगाव ने उन्हें फसलों के डॉक्टर के नाम से मशहूर कर दिया। दरअसल, बरेली के डॉ. विकास वर्मा ने ‘बैचलर ऑफ होम्योपैथी मेडिसिन’ की डिग्री हासिल करने के बाद प्रैक्टिस में नाम कमाना शुरू किया, लेकिन अच्छी प्रैक्टिस के बाद भी उन्हें लगा कि जिंदगी में कुछ छूट रहा है और इसी छूटे हुए की तलाश में वह खेत-खलियान तक पहुंच गए और ऑर्गेनिक फार्मिंग करने लगे।

डॉक्टर विकास वर्मा बताते हैं कि जिस तरह होम्योपैथिक दवाइयां इंसानों पर काम करती हैं।उसी तरह यह दवाइयां फसलों और पशुओं पर भी काम करती है. पौधे की रोग प्रतिरोधक शक्ति उसे शक्तिमान बनाती है और उसके तंत्र को मजबूत करती है और पौधे को अन्य बीमारियों व कीट पतंगों के प्रकोप से भी बचाती हैं। होम्योपैथिक दवाई पौधों की इम्यूनिटी पर काम करती है। इस तरह खेती में महंगे रसायनों का स्प्रे भी नहीं करना पड़ता और उत्तम क्वालिटी का जहर मुक्त उत्पादन होता है।

किसानों के लिए उम्मीद की किरण हैं डॉक्टर विकास वर्मा

अखा में आलू, गेहूँ, दलहन की खेती करने वाले किसान ऋषि पाल सिंह ने बताया कि पहले वह कैमिकल कीटनाशक और फर्टीलाइज कर यूज कर रहे थे। जब तक वह इनका प्रयोग करते थे तब तक तो फसल ठीक रहती थी मगर छोड़ने के बाद पैदावार कम हो जाती है। इसके बाद जब इन्हें होम्योपैथी इलाज के बारे में पता चला तो उन्होंने इसका भी प्रयोग करके देखा इसके इलाज से पहले तो उन्हें साल-दो साल ज्यादा कोई फायदा नजर नहीं आया। मगर बाद में इससे काफी फायदा होने लगा। फसल पहले की तुलना में ज्यादा अच्छी दिखने लगी और पैदावार भी बढ गई।

Agrohomeopathy: Meet Vikas Verma, doctor of humans, animals and plants, his story will surprise you

होम्योपैथी का इलाज कैमिकल इलाज से पड़ता है सस्ता

हरदोई जिले के एक किसान से जब बात की गई तो उन्होंने बताया कि वह गेंहू, मक्का, धान, मैंथा की खेती करते है। इनका कहना है कि होम्योपैथी के सहारे एक साथ से कैमिकल खादों को नहीं छोड़ा जा सकता। यदि किसान ऐसा करता है तो उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है। हां, धीरे-धीरे करके रासायनिक खादों को छोड़ते जाते है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि होम्योपैथी के इलाज से न केवल फायदा होता है बल्कि यह होम्योपैथी की दवा से फसलों का इलाज करना काफी सस्ता पड़ता है।

कैसे इलाज करती है होम्यौपैथी की दवा

होम्योपैथी की दवा बीमारी पर नहीं बल्कि इंसान की इम्यूनिटी बढ़ाने का काम करती है। जिसकी वजह से इंसान की बॉडी खुद-ब-खुद ठीक हो जाती है। ठीक इसी तरह से यह पौधों पर भी काम कर रही है। यह पौधों पर भले ही काम न करें, मगर उनकी इम्यूनिटी को खासा बढ़ा देती है। जिसकी वजह से फसल में होने वाली बीमारी को फसल अपने आप हील कर लेती है। कुछ कृषि वैज्ञानिकों ने इसकी हकीकत जानने के लिए किसानों के साथ इसका प्रैक्टिकल किया। जिसमें पता चला कि यह तो वाकई काम कर रही है। फसल की क्वालिटी इम्प्रूव हुई, उसकी प्रजनन क्षमता बढ़ी। यानी कुल मिलाकर देखा जाए तो होम्योपैथी से फसलों का इलाज बहुत बेहतर ढंग से संभव है।

अब तक पहुंच चुके है 15 प्रदेशों में

डॉ. विकास वर्मा का कहना है, कि वह अब तक होम्योपैथी से फसलों का इलाज करने के लिए 15 राज्यों तक पहुंच चुके है। इन राज्यों में करीब डेढ़ हजार लोग इनसे जुड़े हुए है। जो होम्योपैथी से अपनी फसलों का इलाज कर रहे है। उन्हें फायदा भी हो रहा है। विकास सभी किसानों को मुफ्त दवा मुहैया कराते है।

किसानों को कैसे देते है दवा

डॉ़ विकास बताते है कि यह दवा फसल में कोई अधिक मात्रा में नहीं लगती है। जो भी किसान उनसे दवा लेने आता है। वह उस दवा को पहले एक पानी की बोतल में घोल देते है। बाद में किसान को दे देतें है। साथ ही यह भी बता देते है कि इसे कितने पानी में मिलाकर छिड़काव करना है। इससे दवा खराब नहीं होती है। जबकि रासायनिक दवाएं किसानों को काफी मंहगी भी पड़ती है और वह खतरनाक भी होती है। जब उनसे पूछा गया कि वह फसल के हिसाब से दवाई की मात्रा को कैसे सेट करते है। तो उन्होंने बताया कि हर फसल में अलग मात्रा में दवाई लगाई जाती है। उन्होंने बताया कि यदि किसी एक बीघा खेत में मिर्च की खेती है और उस मिर्च में फंगल इंफेक्शन (लीफ कर्ल) हुआ तो उसमें 180 एमएल दवा लगेगी।

क्या यह भी रासायनिक खादों की तरह नुकसान करती है

अभी तक इसका टेस्ट नहीं किया है। इसके लिए जिस तरह से केमिकल खादों को लगाने के बाद टेस्ट किया जाता है। उसी तरह से इसका भी टेस्ट होना चाहिए। फसलों में कैमिकल की मात्रा जानने के लिए केमिकल रेजिड्यूल टेस्ट कराया जाता है। इससे यह पता लगता है कि इन पौधों में बचा हुआ केमिकल लोगों के लिए कितना खतरनाक है। इसी तरह से इसका भी टेस्ट किया जा सकता है। डॉ. विकास वर्मा ने कहा कि अभी तक इसका टेस्ट नहीं किया गया है। हां, लेकिन वह इस बात पर पक्के है कि यह लोगों को नुकसान नहीं पहुंचाएगी। क्योंकि होम्योपैथी की दवा जब फायदा नहीं करती तो नुकसान भी नहीं करती।

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कैसे आया डॉक्टर के दिमाग में इलाज का आइडिया

होम्योपैथी के डॉक्टर विकास वर्मा का कहना है कि वह पहले फसलों का इलाज नहीं किया करते थे। न ही इसके बारे में कुछ सोचा था। उनके घर में काफी पुराना एक नींबू का पेड़ था। जिस पर नींबू नहीं आया करते थे। पेड़ पर सभी तरह की कैमिकल दवाओं का इस्तेमाल करके देख लिया। मगर कोई फायदा नहीं मालूम हुआ। परिवार वालों ने कहा कि अब इस पेड़ को कटवा ही देते है। इससे कोई फायदा नहीं। जब पेड़ के कटने की नौबत आई तो उन्होंने कहा कि अब यह पेड़ कट तो रहा ही है। क्यों इस पर भी होम्योपैथी का इलाज करके देखा जाए। इसलिए उन्होंने उस पर पेड़ का होम्योपैथी से इलाज करना शुरू किया। कुछ ही दिनों में पेड़ पर फूल आने लगे। इसे देखकर उनके मन में और उत्साह जागा। उन्होंने उसका आगे भी और इलाज किया। कुछ ही दिनों में उस पेड़ पर नींबू आना शुरू हो गए। तब से उन्होंने होम्योपैथी से फसलों का इलाज करना शुरू कर दिया।

किन-किन दवाओं का कितनी मात्रा में प्रयोग करते हैं

डॉ. विकास वर्मा ने बताया कि यदि किसी फसल में वायरल या बैक्टीरिया इंफेक्शन हुआ है तो वह उसमें कैल्थेरिया सल्फर, कालीम्यूर, फैरमफॉस, साइलीसिया, सल्फर, मैक्ट्रम म्यू आदि दवाओं का इस्तेमाल करेंगे। उन्होंने बताया कि यदि एक बीघा खेत में मिर्च की फसल है और उसमें वायरल इंफेक्शन (लीफ कर्ल) हुआ है। तो उसमें इन दवाओं में से केवल 50 एमएल ही दवा ही लगाई जाएगी। जिससे उसका वायरल खत्म हो जाएगा। वायरल से पीड़ित इंसान को भी यही दवाएं दी जाती हैं जो उसकी इम्युनिटी बढ़ा देती हैं।

यह भी जान लीजिए

डॉ. विकास वर्मा ने बताया कि उन्होंने यह प्रयोग पहले अपने फार्म पर किया और इसी तकनीक से अमरूद, गन्ना, गेहूं, धान, सरसों, हल्दी, अलसी, लेमन ग्रास, मसूर, चना, उड़द आदि की खेती कर रहे हैं। साथ ही, भारत के कई प्रान्तों से किसान उनसे दवा मंगवा रहे हैं। जैसे- मध्य प्रदेश के मक्का और मिर्च के किसान, गुजरात के प्याज, मूंगफली और कपास के किसान. छत्तीसगढ़ के धान के टमाटर और अमरूद, महाराष्ट्र के मौसंबी, संतरा, अमरूद, उत्तर प्रदेश के आम, अमरूद, गन्ना गेहूं, धान, मेंथा, चना, मिर्च आदि।

उत्तराखंड के बेर, अमरूद के किसानों को फायदा

उत्तराखंड के बेर, अमरूद आदि के किसान लाभान्वित हुए हैं। उनका कहना है कि कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोगों से कैंसर और किडनी फैलियर के मामले लगातार बढ़ रहे है। ऐसे में होम्योपैथी से कृषि यह एक ऐसा नवाचार है, जो आमजन की सेहत के साथ-साथ कृषि क्षेत्र में होने वाले खर्चों को बहुत हद तक घटाएगा और जहर मुक्त उत्तम गुणवत्ता वाली फसल का उत्पादन होगा।

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